अगर दिल खोलते यारों के साथ

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सुना है कि एक हार्ट हॉस्पिटल के ऑपरेशन-कक्ष  पर लिखा था ,” अगर दिल खोलते यारों के साथ तो खुलवाना न पड़ता औजारों के साथ “
एक दिन कार्यालय में मैं बहुत परेशान हो गया था। तभी एक मित्र अपनी समस्या-समाधान हेतु मेरे कक्ष में आये। उनकी बातें धैर्यपुर्वक सुनकर मैंने समस्या सुलझाने के लिये उनसे दो-तीन महीनों का समय माँगा।
परन्तु वे अपनी समस्या के शीघ्र समाधान पर अड़ गये. मस्तिष्क पर बहुत जोड़ देने के बावजूद मुझे उनकी समस्या का अविलम्ब कोई हल नजर नहीं आया. मैंने उन्हें समझाने कि पुरजोर कोशिश की, लेकिन दुर्भाग्यवश वे नहीं माने। अंत में खीजकर मैं उनसे लड़ बैठा. यदि प्रारम्भ में ही मैं उन्हें अपनी मनःस्थिति के बारे में बता देता तो शायद वे उस दिन अनावश्यक दबाब न देते और अप्रियता टल जाती।
एक बार मोटरसाइकिल से गिरने के कारण मेरे पाँव के घुटनों में हलकी चोटें आ गईं। मैं घर पर आराम कर रहा था, तभी मेरे मित्र राजीव जी ने फोन किया। मेरी बातों में गर्मजोशी नहीं थी और आवाज भी थकी-थकी थी। उन्होंने अविलंब ताड़ लिया कि मैं परेशान हूँ। मैंने उन्हें दुर्घटना के बारे में बताया तो वे मीठी झिड़की देने लगे,” आपने पहले क्यों नहीं बताया ?” पहले पता हो जाता तो मैं आपसे अपने काम के बारे में आज बात नहीं करता।”
राजीव जी की सलाह अमल करने लायक है।
यदि आपकी मनःस्थिति किसी कारणवश  ठीक नहीं हो तो आप अपने दोस्तों और सम्बन्धियों को बता दें ताकि वे आपको  मानसिक सम्बल दें।
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