अदृश्य मनोवैज्ञानिक रंगीन चश्मे उतार कर फेंक दें.

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हमारी आँखों पर लगे अदृश्य मनोवैज्ञानिक रंगीन चश्मे हमें जीवन भर खुशफहमी और धोखे में रखते हैं. हम न तो अपने-आप को और न ही दूसरों को उनके वास्तविक रूप में देख पाते हैं. परिणामस्वरूप निरर्थक झगड़ों और तनावों में जीवन लक्ष्य से भटक जाता है.

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‘एथेंस का सत्यार्थी’ के नायक ने नँगा सत्य देखने हेतु हठ किया। परिणामस्वरूप, वह अंधा हो गया।

 
अपने बारे में नग्न सत्य हम भी सहन नहीं कर पाते हैं। अतः अपनी आंखों पर अदृश्य मनोवैज्ञानिक रंगीन चश्मे लगाकर खुद को धोखा देते हैं।
 
अमिताभ बच्चन की सुप्रसिद्ध फ़िल्म शराबी याद कीजिये। शराब की अपनी बुरी लत को तर्कसंगत बनाने के लिए एक गाने में उन्होंने सारे संसार को नशे में धुत बता दिया।
 
 
प्रत्येक व्यक्ति अपनी आंखों के सामने पाक-साफ दिखना चाहता है। मसलन यदि मैं कामचोर हूँ तो कम से कम अपनी नज़रों के सामने गिरना नहीं चाहूँगा। अतः अपने-आप को ठगने के लिए मैं अदृश्य मनोवैज्ञानिक रंगीन चश्मे पहन लेता हूँ, जिस चश्मे से सारा विश्व कामचोर दिखता है। लेकिन बात इतने पर समाप्त नहीं होती है। मुझे दूसरों को कामचोर साबित करके दिखाना पड़ेगा, ताकि मैं अपनी कामचोरी को आम इंसानी कमजोरी मानकर तर्कसंगत साबित कर सकूँ।

यहीं से सारे झगड़ों की शुरुआत होती है। मैं अपने अधीनस्थों पर कामचोरी का आरोप लगाता हूँ, चाहे वे कितनी ही तन्मयता या अतन्मयता के साथ अपना कार्य कर रहे हों। वे भी मेरा प्रतिरोध करना प्रारम्भ कर देते हैं। फिर गुट बन जाते हैं। लोग एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिये जी-जान लगाने लगते हैं और अपने दिन की चैन और रात की नींद हराम कर लेते हैं।

 
परस्पर आरोप-प्रत्यारोप के बीच टीम-भावना की बलि चढ़ाई जाती है और परिवार, समाज और संस्थाएं इसका भारी मूल्य चुकाती हैं।
टीम-भावना समाप्त होने के कारण हम निर्रथक झगड़ों में फंस कर रह जाते हैं। परिणामस्वरूप, हम मनोवांछित सफलताएँ नहीं प्राप्त कर पाते हैं. ये अदृश्य मनोवैज्ञानिक रंगीन चश्मे हमारे अधिकांश अरमानों पर पानी फेर देते हैं। 
 
आखिर इस गम्भीर बीमारी का क्या इलाज हो सकता है? अपने गतिशील विचारों को टिप्पणी-बॉक्स में डालकर हमें भी अनुगृहित करें.
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