अवसाद से आरम्भ और उल्लास से अंत।

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4 मार्च, 2017 को बिस्तर छोड़ते समय मैं बेहद दुखी था । मेरा पूरा शरीर आलस से सराबोर था। किसी काम में मन नहीं लग था और पूरा संसार निरर्थक लग रहा था। भारी मन से मैं केन लेकर दूध लेने गया। इसी क्रम में मैं रामकृष्ण आश्रम भी टहलते चला गया। वहाँ की हरियाली और खुबसूरत फूलों की क्यारियों से मुझे कुछ सकुन मिला. घर लौटने के पश्चात मैं कुछ अच्छा महसूस कर रहा था। यह संसार अब उतना निरर्थक नहीं लग रहा था।

फिर भी कार्यालय जाने की इच्छा नहीं हो रही थी।  जी चाहता था कि आकस्मिक अवकाश लेकर घर में ही बैठूँ। तभी मुझे हाई स्कूल के समय पढ़ा हुआ वह लेख याद आ गया जिसमें मूड बनाने का अचूक मंत्र दिया गया था।  लेखक ने लिखा था कि अगर किसी आवश्यक कार्य करने का आपका मूड नहीं हो, फिर भी आप उस कार्य में तत्क्षण जुट जाएँ। धीरे-धीरे मूड स्वतः बन जाएगा।
अपराध विज्ञान भी कहता है कि प्रारम्भ में प्रत्येक व्यक्ति अपराध से घृणा करता है, लेकिन परिस्थितिवश वह उसमें संलग्न होता है तो वह अपराध सहने लगता है, कुछ समय के अंतराल पर वह अपराध में पूरी तरह रम जाता है।
अतः मैंने स्नान-ध्यान करके अपनी सफेद मारुती स्टार्ट की और कार्यालय चल पड़ा। एक बहुत पुरानी समस्या शाखा में हमें परेशान कर रही थी। उसके समाधान हेतु मैनें अपने साथी रंजन जी को बुलाया था। वे नियत समय से दस मिनट पहले ही पहुँच गये और हमलोग पूरी तन्मयता से कार्य में जूट गये। दो घण्टे में ही चमत्कार हो गया। जो समस्या शाखा को मेरे योगदान के पहले से परेशान कर रही थी, उसका बहुत ही आसान समाधान सहसा मेरे मस्तिष्क में कौंध गया। फिर क्या था ! सारे स्टाफ सदस्यों ने मुँह मीठा करके प्राप्त उपलब्धि का आनंद लिया। उस दिन घर लौटते समय अपनी गाड़ी गैरेज में पार्क कर रहा था तो मेरे पांव जमीन पर नहीं पड़ रहे थे।

उपलब्धि प्राप्त करने की भावना ने मेरे तन-मन को हल्का कर दिया था।  वह शाम परिवार के साथ काफी आनंददायक रहा और रात्रि की निद्रा भी मधुर रही।

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