क्या निजीकरण है, सारी समस्याओं का समाधान ?

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कुछ उत्साही लोग निजीकरण का जोर-शोर से समर्थन करते हैं।

 

 लेकिन, रेल में निजीकरण का प्रयोग पूरी तरह असफल हो चुका है। निजीकरण के बाद रेलों में मनमानी वसूली के बावजूद घटिया भोजन की शिकायत तो आम बात है ही बेड-रॉल की गन्दगी की कहानियाँ भी कुख्यात होती रहती  हैं।
अनेक निजी व्यवस्था वाले शौचालयों में अनुचित वसूली के बावजूद दुर्गंध का राज होता है।

निजी अस्पतालों में किस तरह चार्ज वसूले जाते हैं। यह किसी से छुपा नहीं है। कहीं-कहीं रुपयों के लिए मुर्दों को बंधक बना लिया जाता है; मरणासन्न लोगों को भी कई दिनों तक वेंटीलेटर पर रखा जाता है. यह अवधारणा है कि चिकित्सक दिए गये लक्ष्यों के हिसाब से शल्य-क्रिया की सलाह देते हैं. इस विषय पर बॉलीवुड की एक रोचक फिल्म “गब्बर इज बैक” भी आई थी.

निजीकरण अमरीका जैसे पूंजीवादी देशों में भी अपना भद्दा रूप दिखा चूका है। मंदी के दौरान लेमैन ब्रदर्स, ए आई जी जैसी बड़ी कम्पनियाँ धड़ाम हो गईं। अमेरिकन फेडरल सरकार ने 180 बिलियन डॉलर की सहायता कर AIG को उबारा और उसका नियंत्रण अपने हाथों में ले लिया।

संसार के अनेक देश निजीकरण से होने वाली हानियों को समझने लगे हैं. इंग्लैंड में भी रेल और बिजली का सरकारीकरण करने की माँग होने लगी है, क्योंकि लोग महसूस करने लगे हैं कि निजीकरण के पश्चात गुणवत्ता पहले जैसी ही रही या घट गयी, लेकिन मूल्य अवश्य बढ़ गये.

भारत में भी पूंजीपति अपने निजी कंपनियों के माध्यम से अरबों-खरबों के इंसेंटिव लेते रहे हैं, लेकिन सरकारी बैंकों में पूंजी देते समय अनावश्यक शोर-शराबा होता है। पूंजीपतियों को इंसेंटिव मुफ्त में बांटे जाते हैं, जबकि सरकारी बैंक सामाजिक बैंकिंग सेवा भी देते हैं और  सरकार को  प्राप्त पूंजी पर डिविडेंड भी देते हैं।

निजी व्यवस्था ATM के केअर टेकरस का जम कर शोषण कर रही है। विश्वस्त सूत्रों के अनुसार बैंकों से पूंजीपतियों को प्रति केअर टेकर जितनी राशि दी जाती है, केअर टेकर के जेब में उसकी आधी से भी कम राशि जाती है।

गुडगाँव के फोर्टिस अस्पताल ने डेंगू के इलाज के लिए एक बच्ची के माता-पिता को 18 लाख का बिल पकड़ा दिया. दुर्भाग्यवश बच्ची की जान भी नहीं बच सकी.
अनेक लोग महंगे उपचार और अनियंत्रित मूल्यों के कारण अपना घर-द्वार बंधक रखकर परिजनों का इलाज करा रहे हैं.
पूर्ण निजीकरण के बाद सिर्फ ऐसे ही अस्पताल, विद्यालय और अन्य संस्थाएं रहेंगी जो आम जनता का जमकर शोषण करेंगी.

 संविधान-निर्माताओं ने हमारे देश को कल्याणकारी राज्य का दर्जा दिया है। निजी कम्पनियों द्वारा किये जा रहे शोषण के कृत्य संविधान की भावनाओं के विपरीत हैं।
अनेकों बार पूंजीपति लिमिटेड कम्पनियां बनाकर उनका दोहन करते हैं, फिर उन कम्पनियों को दिवालिया घोषित कर देते हैं, उसमें काम करने वाले सड़क पर आ जाते हैं और उनके बच्चे भूखे मरते हैं, जबकि पूंजीपतियों के ऐशो-आराम में कोई फर्क नहीं पड़ता है। हाल में दिवालिया हुई किंगफ़िशर एयरलाइन इसका उदाहरण है।

भारत में सैकड़ों निजी बैंक भी फेल हो चुके हैं। असफल होने वाले कुछ बैंकों के नाम हिंदुस्तान कमर्शियल बैंक लिमिटेड, नेदुंगड़ी बैंक लिमिटेड, बनारस बैंक लिमिटेड, ग्लोबल ट्रस्ट बैंक लिमिटेड आदि हैं। आम जनता की गाढ़ी कमाई को सुरक्षित करने के लिए सरकार ने इनका विलय सरकारी बैंकों में कर दिया। इस तरह पूंजीपतियों के कुव्यवस्था और मनमानी से डूबे निजी बैंकों का बोझ भी सरकारी बैंकों ने जनहित में ढोया।

निजीकरण में स्वार्थी व्यक्ति येन-केन प्रकारेण अधिक से अधिक लाभ अर्जित करते हैं और यह निर्धनों के शोषण का जबरदस्त माध्यम है।

यदि कोई सरकारी कर्मचारी किसी से अनुचित राशि लेता है तो भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के सेक्शन 7  में
उस कर्मचारी को 3 से 7 वर्ष तक कारावास में रखने का प्रावधान है। लेकिन निजी व्यक्ति किसी से अनुचित वसूली करता है तो वह विजिलेंस या सी.बी.आई. के दायरे में भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के अंतर्गत नहीं आता है और न ही उसके लिए इतने कड़े दंड का प्रावधान है। अतः निजीकरण उपरोक्त कारणों से लूट की खुली छूट देता है।
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9 टिप्पणी

  1. Well said. Now a days government is using privatization as a tool to transfer wealth of nation in the hand of capitalist by transferring healthy undertakings to them. Before privatization a well constructed hypocritical propoganda is spread about negativity of a particular government sector/undertaking just to bring it's share price as low as possible., so that it can be transferred at lowest price. By this means capitalist and associated politicians are making big gain.

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