जिधर देखो उधर ही अवसर

87
 मैं खुद से जो सवाल हर दिन पूछता हूँ,क्या मैं वो सबसे ज़रूरी काम कर रहा हूँ जो मैं कर सकता हूँ?

             — मार्क ज़ुकेरबर्ग

एक ब्राह्मण देवता एक सम्पन्न  गाँव में रहते थे। उनके पास एक काले रंग की घोड़ी थी जिसपर  वे जान छिड़कते  थे और उसपर ही सवार होकर जजमानों के यहाँ जाते थे। एक दिन वे घोड़ी लेकर  पूरब की ओर निकले। उसका मन उस दिन आराम करने का था। अतः वह बेमन से धीरे-धीरे चल रही थी। पंडित जी को गुस्सा आया और उन्होंने घोड़ी को जोर से चाबुक मारा। घोड़ी जोर से हिनहिनाई और पूरब के बदले पश्चिम की ओर दौड़ने लगी। पण्डित जी जोर से चिल्लाये ,” कोई बात नइखे ससुरो, उधरो  दो-चार जजमान बा”

आशावादी और उत्साही लोग कहते हैं,”रुपया आसमान में उड़ रहा हैं , उसे देखने के लिए प्रशिक्षित आँखें  चाहिए और पकड़ने के लिए निपुण हाथ चाहिए। “
एक मूर्तिकार  ने अवसर की प्रतिमा बनाई थी , जिसके सिर के आगे बाल थे और पीछे गंजा था, अतः अवसर को वही पकड़ सकता है, जो उसके आने के पहले पूरी तरह तैयार रहता है। 
मार्क जुकरबर्ग ने  कम्प्यूटर और सॉफ्टवेयर में बचपन से प्रशिक्षण और रूचि लिया। 4 फरवरी, 2004 को उन्होंने हार्वर्ड के अपने डॉरमिटरी से फेसबुक लॉंच किया और आज  संसार के चौथे सबसे अमीर आदमी हैं।  
शेयर करें

कोई जवाब दें

Please enter your comment!
Please enter your name here