न रिवाल्वर ने मारा, न रंगदार ने मारा

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 उसे न तो रिवाल्वर ने मारा, न रंगदार ने मारा, उसे तो उसी के अति-आशावाद ने मार गिराया।
वह गोरा-चिट्टा और लम्बा महत्त्वाकांक्षी युवक अत्यंत तीक्ष्ण बुद्धि का था, तथा अपने माता-पिता के बुढ़ापे का एकमात्र अवलम्ब था। वह कोटा के अच्छे कोचिंग संस्थान में आई.आई.टी. प्रवेश-परीक्षा की तैयारी कर रहा था। सात सौ लड़कों के बैच में उसका रैंक लगभग चार सौ आया था। मुज़फ़्फ़रपुर लौटने हेतु उसकी टिकट कट चुकी थी।  बूढ़े माँ-बाप बेसब्री से उसका इंतज़ार कर रहे थे।
अचानक, वह लापता हो गया। छान-बीन  करने पर उसके कमरे से एक सुसाइड-नोट मिला जिसमें उसने अपने-आपको दोषी और स्वार्थी माना था और लिखा था कि वह अपने माँ-पिता को चम्बल नदी के मंझधार में मिलेगा। पुलिस ने  चम्बल नदी में जाल डालकर उस बेचारे का क्षत-विक्षत शव निकाला। अत्याचारी अवसाद एक बलि और ले चुका था।
अवसाद आस्तीन के सांप जैसा खतरनाक होता है।  आजकल भाग-दौड़ वाली दुनिया में गला-काट स्पर्धा है। अतः अनेक लोग मनचाही  सफ़लता नहीं मिलने पर अवसाद से ग्रस्त हो जाते हैं।
अतः अपने परिवार के सदस्यों और मित्रों पर नजर रखें। साथ ही “ कर्मण्येवाधिकरस्ते मा फलेषु कदाचना।  मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते सङ्गोस्त्वकर्मणि। 
बार-बार जोर से दुहराते रहें ताकि इसे आपके साथ आपके इष्ट-मित्र भी सुनें और उनके मनो-मस्तिष्क पर इसकी अमिट छाप पड़ जाये।
कितना भी भयानक भूकम्प अचानक आ जाये, मजबूत सरिये से बना मकान बच जाता है, इसी तरह अत्यन्त  खतरनाक अवसाद का झोंका भी शक्तिशाली संस्कारों से बने मस्तिष्क पर हावी नहीं हो पाता है। यदि आप   शक्तिशाली  संस्कार बनाना चाहते हैं तो अच्छी बातें  बार-बार पढ़ते, बोलते और सुनते  रहिये।
सभी तरह के छुपे अवसादों की कारगर दवा है,”  कर्मण्येवाधिकरस्ते मा फलेषु कदाचना।  मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते सङ्गोस्त्वकर्मणि। “
अर्थात 
कर्म करना हमारा अधिकार है, फल देना ईश्वर का अधिकार है और ईश्वर जो भी फल देंगे, उसे हम सहर्ष स्वीकार करेंगे और भविष्य में भी पूरी तन्मयता से कर्म करते रहेंगे।
शांति, प्रेम, आनन्द।
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