हिम्मतवाला मांगे माफी

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कुछ इस तरह मैंने ज़िंदगी को आसान कर लिया, किसी से माँग ली माफ़ी, किसी को माफ़ कर दिया।
                                                                                                                        —- मिर्ज़ा ग़ालिब।

 

एक बार मैं अपनी भतीजी को गोद में घूमा रहा था।  तभी मोबाइल की घंटी बजी। एक मित्र का फ़ोन था, जो तब ऊँचे पद पर पहुँच गए थे।  मैंने मल्टी- टास्किंग करने की ठानी, सान्या को दाहिने हाथ से घुमाता रहा और बायें हाथ से मोबाइल पर बात करता रहा। बात-चीत  थोड़ी लम्बी खींच गयी थी। तभी मेरी धर्मपत्नी सान्या को नहलाने के लिए माँगने लगी। वह जाना नहीं चाहती थी, पुनीता उसे जबरदस्ती मेरी गोद से खींच रही थी। सान्या अाँ-उँ करके विरोध दर्ज कर रही थी। अपने मित्र को मैंने अचानक फ़ोन रखने के लिए कह दिया। कहने का स्वर भी अनायास ही अवांछनीय हो गया। खैर, मैनें अगले दिन खेद प्रकट करने का निश्चय किया। अगले दिन मैनें उन्हें फ़ोन भी किया, उन्होंने मुझे कुछ काम दिया था, उसकी प्रगति से भी उन्हें अवगत कराया, लेकिन संकोचवश माफ़ी नहीं माँग पाया।  यद्यपि मेरे मित्र ने सहृदयता का परिचय देते हुए मुझे माफ़ कर दिया था। इस घटना के बाद जब भी मैं उनसे मिला तो पहले जैसी ही गर्मजोशी से मिले।
मैनें भी इस घटना से सीख ली, अब ऐसे मौकों पर मैं शालीनता से कॉल बैक करने का वादा कर देता हूँ।
ऐसी ही एक घटना कुछ महीने पहले मेरी शाखा में घटी। मेरे 35 वर्ष पुराने मित्र ने फ़ोन करके खाते की विवरणी लाने के लिए कहा। मैनें उन्हें बताया कि अभी बहुत भीड़-भाड़ है, मैं शाम में निकलवाकर लेते आऊँगा, वे वार्तालाप लम्बी खींचना चाहते थे, मैंने फिर उनसे दरखास्त किया कि अभी मुझे छुट्टी दीजिये, शाम में विवरणी अवश्य लेता आऊँगा। लेकिन वे नहीं माने, अचानक मेरी आवाज अवांछनीय हो गयी, उन्होंने फ़ोन रख दिया। 35 वर्ष पहले हम दोनों अगल-बगल काउंटर पर बैठकर काम करते थे। अब वे अवकाश प्राप्त कर चुके थे। उनके प्रति मेरे कठोर व्यवहार ने मेरा कलेजा कचोट कर रख दिया।
शाम में घर आकर ब्लड-सुगर जाँचा, जो काफी कम हो गया था। प्राथमिक उपचार के बाद उन्हें फ़ोन करके माफ़ी माँगी, उसके बाद मन हल्का हुआ।

यदि आप दीर्घायु और स्वस्थ रहना चाहते हैं मिर्ज़ा ग़ालिब और हज़रत अली साहब की सलाह गाँठ में बाँध लीजिए।
कई बार माफ़ी माँगना और अपनी गलती स्वीकार करना लाभ का सौदा भी बन जाता है।  1977 में कांग्रेस की अप्रत्याशित और शर्मनाक हार के बाद जब बलि का बकरा खोजा जा रहा था, श्रीमति इंदिरा गाँधी ने पराजय की सारी जिम्मेदारी अपने सिर पर ले लिया। उनके विरोधियों ने भी उनके इस साहस की भूरी-भूरी प्रशंसा की।

अपनी गलती स्वीकारने और खेद व्यक्त करने की आदत मेरे घर, दफ्तर और संगठन में मेरी कठिनाइयाँ काफी कम कर देती है, क्योंकि यहाँ कोई सामान्यतया किसी भी चीज को प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं बनाता है, मेरे नक्शे-कदम पर चलते हुए अपनी गलती भी खुले मन से स्वीकार कर  लेता है।

इस तरह मैं और मेरे साथी तनाव-मुक्त रहते हैं।

हज़रत अली साहब  ने ठीक ही फ़रमाया है–
झुकता वही है जिसमें जान होती है।
अकड़ना तो मुर्दे की पहचान होती है।।

राष्ट्रकवि दिनकर ने लिखा है:-

सहनशीलता, क्षमा, दया को
तभी पूजता जग है
बल का दर्प चमकता उसके
पीछे जब जगमग है।
महान और शक्तिशाली व्यक्तियों की क्षमाशीलता या क्षमा-याचना चहुँमुखी सराही जाती है, लेकिन निर्बल व्यक्ति भी इन गुणों को अपनाकर “रंगभूमि” के पात्र सूरदास की तरह  महान बन जाता है।
वर्षों पहले मेरी सासू माँ ने अपनी क्षमाशीलता से मुझे चकित कर दिया। उन्होंने मुझे फ़ोन करके एक व्यक्ति की सहायता करने का आदेश दे दिया, जिन्होंने मेरे ससुराल पक्ष के लिए अनेक समस्याएँ भूत काल में पैदा कर दी थी। यद्यपि 85 वर्षीय सासू माँ बुढ़ापे की व्याधियों से घिरी रहती है, फिर भी दुर्भावना रहित निर्मल हृदय से परिपूर्ण उनका चेहरा निरंतर चमकता रहता है।

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1 टिप्पणी

  1. अच्छी चीजें जितनी बार दोहरायेंगे, उतनी ही आपके मनो-मस्तिष्क में बैठती जायेंगी। रहीम ने ठीक ही कहा है — करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान, रसरी आवत-जात सील पर पड़त निशान।

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